Thursday, 22 August 2013

संक्रमित काल

आठ वर्ष की बिटिया अचानक बड़ी हो गई
मुझे समझाने और ताने मारने लग गई
प्रश्न पर प्रश्न मन बड़ा अचम्भित है
उत्सुकता में डूबा हुआ मनोरंजन अपेक्षित है
पिता हूँ इसलिए शायद सह लूँगा अपमान
ससुराल वालों की फ़िक्र में हूँ परेशान
उनकी दशा तो सांप छछूंदर वाली होगी
न निगली जायगी न उगलते ही बनेगी
बेटी बड़ी तो हुई पर दिल से नहीं जुबान से
वो सीखती है समाज के संक्रमित काल से
जहाँ मां बाप का सर्वोच्च स्थान नहीं होता
बच्चों को ही आप कह संबोधित किया जाता
 वहां आठ साल की बिटिया बड़ी हो ही जाती है
नचाती है इशारों पर वत्सल्य का लाभ उठाती है 

Friday, 26 July 2013

पहला प्यार

गुलाब की बगिया का  झुरमुट था अच्छा
चमकता चटख लाल फूलों का गुच्छा
बगीचे में मखमल सी घास पे चलती
निगाहें टिकाती फिर पलकें झुकाती
दरियादिली से वो बाँहों में आती
गुच्छा बड़ी कसके आँचल में भरती
अहसास दिल में था चेहरे पे लाली
पहले प्यार की थी छटा ही निराली

Friday, 19 July 2013

दुःख सुख

दुःख आया हमें देख ठिठका
चला गया उलटे पांव
हमें मंजिल तक पहुँचाने
सुख के झूले झुलाने
वो छलता नहीं किसी को
सब समझ का धोखा है
दो छोर हैं जिन्दगी के
दुःख सुख तो उनका लेखा जोखा है 

पहचान




दर्पण देख आज सकते में आ गया
पहचाना खुद को तो अवाक् रह गया
अच्छाइयों बुराइयों का लेखा स्पष्ट था
सर्वत्र सब सुन्दर था द्रष्टि में ही दोष था
संस्कारों की पोटली को यूं ही लुटा दिया
संतुष्टि कहाँ खो गई पता भी नहीं किया
अपेक्षाओं की बेदी पर सर्वस्व हवन किया
प्रेम की देवी का चेहरा ही तोड़ दिया
दर्पण तो दर्पण है सच्चाई दिखा गया
जीवन के मूल्यों की पहचान करा गया


   

Wednesday, 17 July 2013

जीवन की नाव

कागज के जैसी हैजीवन की नाव 
डूबती उतराती है जीवन की नाव 
न सहारा न किनारा न मंजिल है पास 
घिरता है अँधेरा घटती हर साँस 
तेज हवा में मचलता है पाल 
उड़ा ले जाने को व्याकुल है काल 
तूफानी लहरों से टकराती है जांबाज 
पुकारती है प्रभु को बिना आवाज 
जगाती है दिल में आत्मविश्वास 
पार जाने की है अटूट आस 
बढ़ी जाती है अपनी ही धुन में 
करती हुई नर्तन अपने ही मन में 
डूबती उतराती जीवन की नाव 
कागज के जैसी वो जीवन की नाव 

सुनहरा अहसास

शायद आज मिली है मुझे अपनी पहचान
जिससे थी मैं अब तक पूरी तरह अन्जान
सिमटी और सिकुड़ी जिन्दगी को दे दिया हवा का रुख
कल्पनाओं का सागर उमड़ रहा है खोकर अपनी सुध
अपने ख्वाबों में ही छुपा रखा था जो हमने सब्जबाग
आज महसूस किया है दिल से वो सुनहरा अहसास
वो सुनहरा अहसास ,वो सुनहरा अहसास 

Friday, 12 July 2013

अच्छा लगता

अच्छा लगता शान्त सतह को
चीर चीर कर आगे बढना
कभी रात्रि में अच्छा लगता
घर से बाहर दौड़ लगाना
हैप्रफुल्ल मन अच्छा लगता
एक दूसरे को अपनाना
आँचल से वो हवा डुलाना
नैनो की मनुहार समझना
गीले गीले बाल सुखाना
अच्छा लगता है सहलाना
कैसे सीखा हमने ये सब
साथ निभाना प्यार लुटाना
अच्छा लगता शान्त सतह को
चीर चीर कर आगे बढना 

Wednesday, 10 July 2013

वो चले गए

कल रात मेरे सपने में वो, मिलते ही मुझसे यूँ बोले
तुम तो वैसी ही लगती हो जैसे छोड़ा बरसों पहले

मादक मुस्कान बिखेर रही, लब  पर मेरा ही नाम लिखे
नैनो में चंचलता बसती, पलकों पर बोझ हो  मेरा लिए

बलखाती नदिया के ही हैं, दो पाट बना डाले हमने
तुमने तो निभाया वादा है, सावन की बदली सी बनके

कल रात मेरे सपने में वो आये और मिलकर चले गए
वो चले गए,वो चले गए ,वो चले गए ,वो चले गए  

पूर्णता की प्राप्ति

बाहर तूफान बड़े वेग से चल रहा था
परन्तु मेरे अन्दर हवा का प्रवेश तक न था
कालिमा के कारागार में बंद हुई सासों से मुक्ति का अहसास
ईश्वरीय शक्ति को भूतल पर उतारने का साहसिक प्रयास
नियति ने तपती हुई वसुधा को क्षितिज से मिला दिया
गर्म वाक्य के धुंए से घुटकर मरने से अच्छा धधक कर जला दिया
पवित्र अग्नि में शरीर पञ्च तत्व में विलीन हो रहा था  
परम नीरवता में पूर्णता की प्राप्ति का संबल मिला था


Tuesday, 29 January 2013

फिर से मुस्करा ले

सच जो बदल न पाया उसे सहने की हिम्मत जुटा ले
अकेले पन से मिला दुःख अब आँचल में छुपा ले

तिरस्कार में आंसू बहें तो वह भी बह जाने दे
जी ले कुछ ऐसे पल जो आत्मा को तृप्त कर दे

सपने जो इन्द्रधनुष के रंगों वाली तितली बना दे
प्रेम जो सोलह श्रंगार किये दुल्हन सी सेज सजा दे

संघर्ष ही जीवन है अब नए जीवन को गले लगा ले
भूल जा शिकवा शिकायत और फिर से मुस्करा ले   

Monday, 7 January 2013

तुम और मैं

तुम असीम मैं छुद्र बिंदु हूँ
तुम अगाध तो मैं सीमित हूँ
तुम स्रष्टि रचयिता मैं रचना हूँ
तुम प्रेम पुजारी मैं प्रियतम हूँ
तुम घर आँगन मैं उपवन हूँ
तुम लोरी मैं स्वप्न सद्रश हूँ
तुम अनंत और मैं अंकुर हूँ
तुम और मैं मिल एक बिंदु हूँ 

Sunday, 23 December 2012

कलयुगी पूत

गुम हो गया मुझमें ही, मेरा वो बचपन
आत्मा को ही छीन ले गया, आते ही यौवन
अपने अन्दर की उस चीख को, चाहती हूँ भूल जाना
नासूर बनगया है पुरुषत्व का, परचम लहराना
घृणा होती है अब अपने ही, इस रूप से
जो विरासत में मिला है, इस कलयुगी पूत से .

Monday, 11 June 2012

आप

रहते हो साथ
जैसे हवा का वास
जीवन में विश्वास
खुशबू का अहसास
ह्रदय में स्पन्दन
विपत्ति में क्रन्दन
कहानी में चरित्र
पात्रों की अभिव्यक्ति
तूलिका में रंग
प्रक्रति के संग
कविता में शब्द
मन में आनन्द
जीव में आत्मा
आत्मा में प्रकाश
प्रकाश में आप
रहते हो साथ 

Monday, 14 May 2012

माँ

माँ तुम  हो तो 
घर घर है 
नहीं तो सिर्फ  मकान है ..

माँ तुम  हो तो
घर आने का चाव है
हर दिन  एक  त्यौहार है ..

माँ तुम  हो तो
सर पर स्नेहिल हाथ है 
जीवन में उल्लास है ..

माँ तुम  हो तो 
मायका गुलज़ार है 
मूर्तियों में भी जान है ..

माँ तुम  हो तो ...





मात्र दिवस

हम को अपनाया पुंजीभूत  किया तुमने 
थी रिताम्बरा प्रज्ञा की आत्मा रूप सी तुम 
माँ मात्र दिवस  पर बहुत  याद आई हो तुम  

जैसे आंधी का झोंका दीपक  बुझा गया 
निज  काया की ममता को छोड़ गई हो तुम 
माँ मात्र दिवस  पर बहुत  याद आई हो तुम  

पतझर मिटाकर  लाने को मधुमय  बसंत 
स्वजनों के लोचन  नम  करके हो चली गई तुम 
माँ मात्र दिवस  पर बहुत  याद आई हो तुम  

पथ  से विचलित  कर सकी न कभी मोह माया 
विश्वास  नहीं होता मुझको यूँ छोड़ गई हो तुम 
माँ मात्र दिवस  पर बहुत  याद आई हो तुम  

जो महा ज्योति होती है अविरभाव वही होती 
सत्कर्मो से हो गई  प्रभु की प्यारी तुम 
माँ मात्र दिवस  पर बहुत  याद आई हो तुम 

निशब्द हो गया है आज मेरा ये रोम  रोम 
नम  आँखों से शत  शत  वंदन स्वीकार करो तुम 
माँ मात्र दिवस  पर बहुत  याद आई हो तुम 

Wednesday, 4 April 2012

बातें


जीवन यात्रा में मैंने
मित्र जो बनाये
वो क्या मिलेंगे कभी
जो पीछे छूट गए 
कभी गमगीन हुए 
कभी हर्षा गए 
बड़े याद आये 
जो पल बीत गए 

रिश्ता




औरत और पर्वत का रिश्ता बड़ा पुराना
दुःख साक्षी है जानता है रिश्ता निभाना
पर्वत स्थिर होकर भी विचारशील
शांत अविचलित और गंभीर
मूक दर्शक बन जाते हैं विचार
छातियों में धंस धंस कर करते हैं वार
औरत जिस्म रखती है गिरवी मिटाने को भूख
कोख में करती है सृजन पिलाती है अपना दूध
गगन भेदी आर्तनाद पर वाणी निःशब्द
अदम्य साहस का दिखाती है उपक्रम
निरुपाय है क्या करे जानती है कसौटी का सच 

Tuesday, 13 March 2012

एहसास

उनका स्पर्श ,बिना कहे ही सब कुछ कह जाता
उनका रेखांकन ,बिना बोले ही समझ में आ जाता
उनका व्यवहार ,बिना पहचान अस्तित्व का बोध करा जाता
उनका चिंतन ,बिना मध्यस्थ परमात्मा से साक्षात्कार करा जाता
उनका वक्तव्य ,बिना प्रवचन सत्संग का एहसास करा जाता

 

अंतर्मन के भाव

मेरे लिखे चंद शब्दों को
लोग कविता कहने लगे
पर ये कोई कविता नहीं
अंतर्मन के अव्यक्त भाव हैं
जो मुझसे पहले भी थे
मेरे जाने के बाद भी रहेंगे
नश्वर काया जब तक मेरी है
शब्द भी मेरे हैं और भाव भी मेरे 

Wednesday, 7 March 2012

होली

जिंदगी अपनी है पर खुद ही अवगत नहीं
खुशियाँ दिलो दिमाग में है समाई दुःख की न लेशमात्र परछाई है
शाश्वत आकार को खुशियाँ खोजनी नहीं होती स्वतः मिलती हैं
प्रेम की पराकास्ठा में तल्लीन मन किसी वस्तु का मोहताज नहीं होता
प्यार की मदहोशी में मना लो होली रंग लो तन और मन वक्त किसी का गुलाम नहीं होता